Page 48 - E-Patrika 4th English Edition
P. 48
क याद ...
जब भी कभी अपनी आखा से आसू बहाया ह,
ँ
ँ
ै
हर एक कतरा तेरे दामन को भगो कर आया ह।
ै
तरस से गए ह ये कान अब सुनने को वो बात,
क बड़ा होने तक तूने मुझको कतना सताया ह।
ै
जब भी कभी करता था गलती तो टोक दया करती थी,
घर से देर रात बाहर नकलने को रोक दया करती थी।
अब भी उस दहलीज पर आकर रुक जाते ह ये कदम,
जहा पर सर काकर जाने को तू टोक दया करती थी।
ँ
मेरे चेहरे क उदासी को बस तू पढ़ा करती थी,
शट क े उस टूटे बटन को बस तू जाड़ा करती थी।
ै
ै
ँ
ै
सब क ु छ ह, मा, पर अब वसे बोलने वाला कोइ नह ह,
जसे आधी रोटी और खलाने को तू ज़द पर अड़ा करती थी।
ै
नजर अब कोइ उतारता नह , प्यार से थपक कोइ मारता नह ,
ै
दद म अब कसी को पुकारता नह , रात सरहाने बठ कोइ गुज़ारता नह ।
ँ
अब हार सा गया इस जदगी से लड़-लड़कर मेर मा,
ँ
तेरा हाथ अगर आज सर पर होता तो म हारता नह ।
Mahendrasinh Zala
PA Section : E-07
44

