Page 49 - E-Patrika 4th English Edition
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म ृ ु प्रमाणपत्र - एक बोध कथा ...
                 म ृ ु प्रमाणपत्र - एक बोध कथा ...



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                   एक  रटायड पु लस क मश्नर अपने सरकार  बगले से  नकलकर कॉलोनी म  बने अपने  नजी

      घर म  रहने आ गए। उन्ह  अपने पद और प्र त ा पर बेहद गव  था। हर शाम वे कॉलोनी क े  पाक म  टहलने
      जाते, ले कन  कसी से बात करना उन्ह  ज़रूर  नह  लगता। आसपास क े  लोगा  को वे अपने स्तर का नह
                                              ै

                                                                                  ै
      मानते थे। एक  दन पाक क  ब च पर बठ े  थे  क एक बुजुग  आकर पास बठ गया और बातचीत शुरू क ।
      क मश्नर साहब ने उसक  बाता  को अनसुना करते हुए अपनी नौकर , पद और रुतबे क  ही बात  करते
                                                                            ै
      हुए कहा - “म यहा इस लए रहता   क्या  क यह मेरा खुद का घर ह।”
                         ँ
                                            ँ


      एेसे कइ  दन बीते।
      वो बुजुग  चुपचाप सुनता रहा।  फर एक  दन बुजुग  मुस्क ु राते हुए बोले—
      “दे खए क मश्नर साहब, बल्ब जब तक जलता ह, तब तक उसक  क मत होती ह। बुझने क े  बाद वह
                                                           ै
                                                                                              ै
                                                                                                                  ँ


                                                                                                    ँ
       कसी भी वॉट का हो - 10, 20, 100 - सब बराबर हो जाते ह। म इस कॉलोनी म  पाच साल से  ,


                                                                      ं
                                                                                      ँ
      ले कन मने आज तक  कसी को नह  बताया  क म दो बार सासद रह चुका  ।”
      क मश्नर साहब चाक गए।

      बुजुग  ने आगे कहा - “आपक े  दाइ ओर बठ े  वमा  जी रेलवे म  जनरल मनेजर थे। सामने जो राव साहब

                                                                                  ै
                                                  ै
                                          ं

                                                                               ँ
       ँ
                                                                                                                 ै
      हसते-बोलते  दख रहे ह, वे सेना म  ले  टन ट जनरल रहे ह। और वहा सफ े द कपड़ा  म  जो  शवाजी बठ े


      ह, वे इसरो क े  चेयरमन रह चुक े  ह। ले कन यहा कोइ भी अपने पद और पहचान क  दीवार खड़  नह
                                                         ँ


                             ै
                                    ै
      करता। सब चुपचाप, एक जसे।


      हम सभी बुझ चुक े  बल्ब ह। अब चाहे वो ज़ीरो वॉट का हो या डेकोरे टव एलइड  - बुझने क े  बाद सब
      एक समान हो जाते ह।”

                                                                                      ं
      “पु लस क मश्नर हो या पु लस कास्टेबल— रटायरम ट क े  बाद सब एक ही प क्त म  खड़े होते ह।”

                                          ं

                                                  ं

      “उगता सूरज और डूबता सूरज - दोना  सुदर होते ह। पर दु नया  सफ उगते सूरज को ही प्रणाम करती
       ै
      ह।”
      “यह सच ह, और इसे स्वीकार करना ही जीवन का बोध ह। हम  समझना चा हए  क पद और प्र त ा
                                                                     ै
                   ै
      स्थायी नह  ह। य द हम इन्ह  ही अपनी पहचान बना ल , तो एक  दन सब खो देने का दुःख हम  भटका

      देगा।”
      “शतरज क   बसात पर राजा, वज़ीर और प्यादा - सभी का महत्व तब तक ह जब तक खेल जार  ह।
                                                                                                                  ै
                                                                                         ै
            ं

                                                 ं
      खेल खत्म होते ही सब एक ही  डब्बे म  बद कर  दए जाते ह।”

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                                                                                                              ं
      “जीवन म  चाहे  कतने भी मेडल और स ट फक े ट क्या  न  मल ... अत म  हर  कसी को जो अ तम
                           ै
                                                ै
      प्रमाणपत्र  मलता ह, वह एक ही होता ह - ‘मृत्यु प्रमाणपत्र’...”
                                           Milan Shah
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                                     Instructor, P.T.C. Vadodara
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